Friday, June 8, 2012

प्रथम मुलाकात


भाग्य और नियती से बड़ी कोई वस्तु नही होती है...शिशिर और अनुमेहा के विषय मे भी ये बात बिल्कुल सत्य प्रतीत होती है...जब शिशिर और अनुमेहा पहली बार मिले थे..क्या इस बात का उन्हे तनिक भी आभाष था की नियती ने उनके लिए कितना बड़ा रंगमंच निर्मित कर रखा है..

चिड़ियो के चहचहने की आवाज़ से जब अनुमेहा की नींद खुली तो उसने बिस्तर पर ही लेटे-लेटे उनीदी आंखो से खिड़की के बाहर देखा...दूर तक फैले हुए विस्तृत पर्वत श्रेणियो पे अभी भी हल्के कुहासे के बादल छाये हुए थे.. सूर्य की हल्की - हल्की लालिमा आकाश मे छा रही थी...और खिड़कियो से आते हुए मंद - मंद पवन उसके गेसुओं को धीरे धीरे सहला रहे थे...उसे याद आया आज तो इतवार है..उसने कंबल से अपना चेहरा ढका और फिर से सो गयी..

सुबह का सूरज बादलों के घूँघट से अब बाहर गया था...जैसे लज्जा से नववधू का चेहरा तब तक ही लाल रहेता है जब तक पूर्ण साक्षात्कार नही होता...साक्षात्कार के बाद लज्जा का लोप और सुनहरे प्रेम का उदय होता है..वैसे ही सूर्य के लालिमा की रेखा अब आकाश से धूमिल होने लगी थी...और प्रेम का सुनहरा रंग इस धरा पे छा गया था...
अभी तक सोते हुए देखकर माँ ने अनुमेहा को उठाते हुए कहा: "अनुमेहा उठो बेटा सुबह हो गयी है कब तक सोती रहोगी."
अनुमेहा: "-----"
मा घर के सुबह के कामो मे व्यस्त हो गयी और अनुमेहा अभी भी आराम से निद्रा परी की गोंद मे इस जग से बेख़बर सो रही थी..

पिताजी अख़बार के पन्ने पलट रहे थे...चाय का प्याला लेते हुए अनुमेहा की मा से पूछा ...अरे अनुमेहा कहा है दिखाई नही दे रही है...
मा:सो रही है अभी तक..
पिताजी ने चाय ख़तम कीऔर अंदर के कमरे मे गये जहा अनुमेहा कंबल मे अपना मूह छुपाये आराम से सो रही थी..
अरे उठो बेटा...पिताजी ने उसके चेहरे से कंबल उठाते हुए कहा पिताजी को कंबल खिचते देख वो और दुबक गयी कंबल के अंदर
ऐइ गिलहरीउठ पिताजी ने हसते हुए कहा
अनुमेहा: पापा आज तो इतवार है. सोने दीजिए ना..हू..हू..हू..
उठ जाओ बेटा चलो पार्क मे घूम के आएँगे...
अनुमेहा..आँखे मिवहते हुए..उठी और खुशी खुशी बोली पार्क मे जाएँगे..ही ही ही..और ना पापा लौटते हुए जलेबी भी लेके आएँगे.. और झट से उठ गयी

अनुमेहा अभी छठवी कच्छा की विद्यार्थी है...पड़ने मे मेधावी..बात मे अत्यंत कुचल और अत्यधिक चंचल..उसकी शरारटो और बातो का सिलसिला कभी ख़तम ही नही होता..रंग गोरा लंबी नाक और बड़ी बड़ी आँखे..और सबसे सुन्दर उसके होंठ..बड़े - बड़े कुशलता से तराशे हुए.. और बिल्कुल गुलाबी जैसे अगर ज़रा सी भी ठेश लगेगी तो रक्त छलक पड़ेंगे....


पेशे से डॉक्टर अनुमेहा के पिताजी अत्यंत मिलनसार, मृदुभाषी बड़े ही सज्जन आदमी थे.. डॉक्टर साहब का छोटा सा परिवार है अनुमेहा और उसकी मा ..बस कुल मिलाके कुल तीन लोग.. बल्कि यूँ कहा जाए की कुल चार लोगो का परिवार है तो ये बात बिल्कुल भी ग़लता नही होगी..विधवा प्रेमा मौसी को भी तो डॉक्टर साहब अपने परिवार का हिस्सा ही मानते है... प्रेमा मौसी जिनको मा अपने गाँव से लेके आई थी.. और जो अब उन लोगो के साथ ही रहेती है और घर के कामो मे माँ का हाथ बटाती है..  बड़ा सा आलीशान बंगला  ...अपना खुद का अस्पताल..परमपिता के आशीर्वाद से संतुष्ट और संपन्न ..

जब अनुमेहा और डॉक्टर साहब पार्क से लौटे तो.. लगभग नौ बाज गये थे.. घर आके अनुमेहा अपने खेल कूद मे व्यस्त हो गयीडॉक्टर साहब हस्पताल जाने के लिए तैयार होने लगेउनको तैयार होते देख मा ने पुछा अरे आज तो इतवार हैआज भी अस्पताल जाएँगे क्या ?
डॉक्टर साहब ने हसते हुए कहा पता है लेकिन कुछ ज़रूरी काम है इसलिए जाना पड़ेगा.
अरे लेकिन आज तो भाई साहिब आ रहे है नाभूल गये क्या?
अरे याद है मुझे किंतु वो लोग तो दोपहर तक आएँगे और वो जब तक आएँगे तब तक मै वापस आ जाऊँगा



दोपहर का समय, अनुमेहा दौड़ती हुई बैठके मे गयी और अपने धुन मे जैसे ही कुछ बोलने वाली थी..उसने बैठके मे कुछ लोगो को बैठे हुए देखा उसकी आवाज़ गले मे ही रह गयी....

माँ ने कहा: अरे बेटा नमस्ते करो चाचा और चाचीजी को...
अनुमेहा ने बड़ी ही शिष्टता से हाथ जोड़ के धीरे से कहा.."नमस्ते"..और फिर पैरो से फर्श पे लकीरे बनाने लगी..
वयस्क अपनी बातो मे व्यस्त हो गये... अनुमेहा जाके के माँ के पास बैठ गयी... और माँ के सारी के कोरो को अँगुलियो मे फसा के खेलने लगी....उसने कनखियो से देखा एक सवला पतला दुबला सा लड़का बड़े वाले सोफे पे अपने माँ के साथ बैठा था..

शिशिर के पिता ने बातो का सिलसिला आगे बढ़ाते हुए कहा: डॉक्टर साहब कही नज़र नही रहे..??
अरे वो तो अस्पताल गये है..दरअसल वो जाने वाले नही थे किंतु कोई ज़रूरी काम गया तो जाना पड़ा..:माँ ने कहा        
तब  तक प्रेमा मौसी चाय लेके गयी..और सबको परोसने लगी..
अनेक तरह की मिठाइया..नमकीन और चाय देखकर तो शिशिर की आँखे चमक गयी..किंतु बेचारा शिष्टाचार वश बैठा रहा..
प्रेमा मौसी सारी चीज़े मेज पे रख रही थी..और अनुमेहा दादी अम्मा की तरह उसको हिदयते दे रही थे ये ऐसे रखिए और वो ऐसे रखिए..
माँ ने औपचारिकता वश सबको कहा अरे लीजिए ना आप लोग..अरे बेटा शिशिर तुम तो बड़े चुप बैठे हो कुछ खा भी नही रहे हो..उसके संकोच को भपते हुए कहा..

खाने पीने का दौर चल ही रहा था की डॉक्टर साहब ने प्रवेश किया...लीजिए अनुमेहा के पिताजी भी गये...फिर बातो का सिलसिला चल पड़ा..

माँ ने शिशिर को बिलकुल चुपचाप बैठे हुए देखा तो अनुमेहा से कहा..अरे बेटा अनुमेहा, शिशिर को पीछे बगीचे से अमरूद तोड़ के खिला दो..
अनुमेहा ने आँखे बड़ी करके माँ की ओर देखा...और फिर शिशिर की तरफ..शिशिर तो सकुच गया और उसने ..आँखे नीचे कर ली..
बेटा शिशिर जाओ अनुमेहा के साथ..पीछे बगीचे मे बहोट आचे अमरूद लगे है...अरे हा बेटा शिशिर जाओ डॉक्टर साहब ने मुस्कुराते हुए कहा और अनुमेहा को देखा

अनुमेहा शिशिर का इंतेजार किए बिना ही निकल गयी..और शिशिर उसके पीछे - पीछे चल पड़ा..अनुमेहा आगे-आगे और शिशिर उसके पीछे - पीछे चला जा रहा था..
हाँ आए बड़ा..कही के नवाब है जो हम इनके लिए अमरूद तोड़ेंगे और ये खाएँगे..ये कहेते हुए वो झटपट पेड़ पे चढ़ गयी..उसने शिशिर से कहा: यहा पेड़ के नीचे आके खड़े हो.. मैं अमरूद तोड़ के फेकुंगी..और तुम पकड़ लेना..शिशिर ने सहमति मे सिर हिलाया..
ये था इनके बीच का प्रथम संवाद..कितना ही साधारण सा दृश्य और उससे भी ज़्यादा साधारण संवाद...
इंसान का पूरा जीवन इन छोटे बड़े दृश्यो से बना होता..और अनंत दृश्यो मे से उसे कुछ ही याद रहते है..बाकी तो इस जीवन के आपा - धापी मे खो जाते है...कुछ दृश्य जिनकी महत्ता तुरंत ही समझ मे जाती है..और उनका उसके जीवन पे कितना प्रभाव पड़ेगा उसक आंशिक अनुमान भी इंसान लगा लेता है..किंतु कुछ दृश्य.. जीनकी महत्ता इंसान को नही पता होती..जब वो भविष्य मे कभी उन भूत की बातो को सोचता है..तब उसे लगता की ये साधारण सी लगने वाली चीज़े जीवन मे कितना असाधारण प्रभाव छोड़ती है
राधाजी और कृष्णा की रासलीला मे कितना रस है उसका अनुभव क्या इन सामान्य आँखो से किया जा सकता है..उसके लिए तो दिव्य दृष्टि चाहिए..और ये दिव्य दृश्य क्या सबके भाग्य मे होता है..ये तो कुछ भाग्यशाली लोग होते है..जिनके लिए ये पटकथा तैयार होती है..और पटकथाकर उपर बैठकर उस दृश्य की पटकथा तैयार करता है और फिर आशीष और आशीर्वाद से सीचता है..और साथ ही तृप्ति का अनुभव करता है...ये कुछ ऐसे दृश्य होते है जिनसे सिर्फ़ अभिनय करने वालो का ही नही बल्कि इस पूरे श्रीष्टि का भविष्य सवरता हैं और कितने ही अपरिभाषित चीज़ो को परिभाषा मिलती है..

ये थी शिशिर और अनुमेहा की पहेली मुलाकात..क्या पता था अनुमेहा को आज जिसके लिए अमरूद तोड़ने मे उसे इतना कष्ट हो रहा है..कल वो उसके लिए कुछ भी करने के लिए तत्पर रहेगी....आज जिससे वो बात भी नही कर रही..कल वो उससे हर छोटी बड़ी बात कहेगी.. उसकी कही हर छोटी बड़ी बात उसकी जीवन नीधी बनेगी..!

Sunday, January 15, 2012

इंद्रधनुषी प्रेम

एक रात अनुमेहा ने शिशिर से पूछा:
ये इंद्रधनुषी प्रेम कैसा होता?
शिशिर ने अनुमेहा का हाथ अपने हाथो मे
लेकर और उसकी आँखो मे देखकर बोला:


शायद तुम्हारे स्पर्श के जैसा होता होगा,
कोमल,निर्मल,
बिल्कुल पवित्र.

तुम्हारे हृदय की धड़कनो के जैसा होता होगा,
अनगिनत,निरंतर,
और गतिशील.

तुम्हारे आँखो मे बसे सपनो की तरह होता होगा,
सुक्ष्म,अदृश्य,
किंतु जीवन-उम्मीदों से भरा
बिल्कुल महत्वपूर्ण.

तुम्हारे अधरो पे बिखरे मुस्कान की तरह होता होगा,
निश्च्छल,निष्कपट,
बिल्कुल स्वच्छन्द.

चाहे जैसा भी होता होगा,
किंतु एक बात तो निश्चिंत है,
हमारे रिश्ते के जैसा ही होता होगा,
सुख-दुख, हँसी-खुशी, प्यार-मनुहार
और अनंत इंतजार...
बिल्कुल सतरंगा...!!!!!


शिशिर मुस्कुराया..अनुमेहा हसी..
 दोनों ने एक दुसरे की आँखों में देखा,
और इंद्रधनुष का एक रंग उनके चारो तरफ बिखर गया....

 -    अतृप्त

Wednesday, November 23, 2011

आप


तुम हो तो ये फूल महेकते है,
तुम हो तो ये तारे चमकते है,
तुम हो तो ये तितलियाँ गुनगुनाती है,
तुम हो तो ये भवरें गीत सुनाते है,

ये पंछियों का चहचाहना तुमसे है,
ये मयूर का मोहित होकर झूम जाना तुमसे है,
इन रिमझिम फूहारो का झिमिर झिमिर कर गीत सुनाना तुमसे है
इन जुगनूओ का रातो मे जगमगाना तुमसे है,

दूर तक फैले कुहासे मे तुम्हारे स्पर्श की कोमलता है,
ठंडी हवा की बयार मे तुम्हारे ध्वनि की निर्मलता है,
धरा के नित नये सृजन मे तुम्हारी ही उत्सुकता है,
कोकिल के हर कुंक मे तुम्हारे ही कंठो की मधुरता है,

तुमसे ही ये तो चाँद चाँदनी बिखेरता है,
तुमसे ही इस अरुण की अरुणिमा की महत्ता है,
तुमसे ही इस ओंस मे निर्मल शीतलता है,
भोर की अंगड़ाई मे तुम्हारे होने की मादकता है,

इन नयनो के नवीन स्वप्न मे तुम हो,
इन आधारो के निश्छल बिखराव मे तुम हो,
तुम इस हृदय की हर निस्वार्थ कल्पना मे हो,
परमपिता के सम्मुख कर झुकाए मेरी हर प्रार्थना मे हो.

तुमसे ही तो ये शब्द बनते है,
कवि की कल्पनाओ को नये आयाम मिलते है,
बिना तुम्हारे ये कहानियाँ कहा होती,
बिना तुम्हारे जींदगी तो होती पर जिंदगानियां कहा होती,

तुम हो तो एक अंतराल परिभाषित होता है,
तुम्हारे बिना इस जीवन की क्या कल्पना है,
तुम हो तो ईश्वर इस धरा को हर छण सृजित करता है,
जीवन को नवीन प्रेरणा से भरता है,

बिना तुम्हारे ये जीवन हमेशा अधूरा रहेगा,
तुम्हारे अनुपस्तिथि मे हर छन तुम्हारी ही बाट जोहेगा,
क्या मिला क्या छूट गया ये कुछ भी याद नही रहेगा,
किंतु तुम ना रहे, तो सब कुछ पाकर भी कुछ नही होने का आहेसास रहेगा,

मेरे जीवन की आराधना
मेरे जीवन के सुकुमार स्वपन,
तुमको इन हृदय की गहराइयो मे बसाया है,
कभी प्रश्नचिन्ह मत लगाना.






Thursday, January 7, 2010

विवाह के पूर्व

दूर सामने पर्वत के पीछे अब सूर्य छिपने लगा है.. कुछ देर पहेले जो आकाश मे लालिमा छाई थी वो अब अदृश्य होने लगी है..और हल्का-हल्का अंधेरा घिर आया है..किंतु शिशिर को इस बदलते हुए परिदृश्य का बिल्कुल भी आभाष नही है वो ना जाने कब से उसी पहाड़ी टीले पे अकेला और शांत बैठा है..जिसपे वो और अनुमेहा घंटो बैठ के अनगिनत बातें किया करते थे..वो एकटक सामने देखते जा रहा है बिना पलके झपकाए..उसे अभी भी याद है जब अनुमेहा उसे पहेली बार यहाँ लेकर आई थी.. और चहकते हुए बच्चो जैसी आवाज़ मे कहाँ था "शिशिर पता है मुझे ये जगह बहोत पसंद है..जब भी मै बहोत उदास होती हूँ..या बहोत खुश होती हूँ..तो यहाँ आ जाती हूँ..देखो ना कितनी शांति है यहाँ पे..नीचे कल-कल बहती नदी की आवाज़ कितनी मधुर लगती है..और दूर सामने पहाड़ो की ये हरियाली मन को कितना मोहित करने वाला दृश्य है..है ना शिशिर"..और गर्व से उसकी ओर देखने लगी..जैसे उसने किसी गुप्त खजाने की जानकारी दी हो शिशिर को..

और शिशिर के होंठो पे अनायास ही मुस्कुराहट आ गयी..और साथ ही उसकी आँखे भर आयी..आँख से आँसू की एक बूँद उसके हाथ पे गिरी तो उसका ध्यान टूटा..और उसने चारो तरफ देखा तो..आसमान मे तारें टिमटिमाने लगे थे..उसने धीरे धीरे अपने हाथों से अपने आँखो को पोछा..वो चुपचाप उठा और धीरे धीरे कदमो से छात्रावास की ओर लौटने लगा..छात्रावास लौट के वो बिस्तर पे चुपचाप लेट गया..खाने पीने की उसको कोई सुध नही है ..लेटे लेटे उसने मेहा का लिखा वो अंतिम पत्र खोला और पढने लगा..पढते-पढते उसकी आँख भर आयी और वो फूट-फूट के रोने लगा..वो बहोत देर तक रोता रहा..रोते रोते उसे कब नींद आ गयी..नही पता..अनुमेहा ने शिशिर को अनगिनत पत्र लिखे हैं..शिशिर आज कल रोज उन पत्रों को पढा करता है..पढते-पढते वो कभी मुस्कुरा उठता और कभी रोने लगता...

शिशिर की रोज की यही दिनचर्या है..वो जब भी सोकर उठता..या तो अपने कमरे मे बिस्तर पे पड़ा रहता..या फिर छात्रावास के बाहर यहाँ-वहाँ दिन भर भटकता रहता..और या तो फिर उस पहाड़ी टीले पे जाके बैठ जाता..देर रात को छात्रावास लौटता..कुछ खाने का मन करता तो ख़ाता नही तो जाके बिस्तर पे चुपचाप लेट जाता..और यदि नींद नही आती तो फिर जाके छत पे बैठा रहता..किसी से कोई बात नही करता..दिन भर उदास और गुमसुम पड़ा रहता है.. पूरे छात्रावास मे हर किसी के होंठो पे सिर्फ़ इसी बात की चर्चा है की शिशिर को क्या हो गया है..क्योकि शिशिर का स्वाभाव बड़ा ही चंचल हसमुख और मिलनसार था ..दिनभर उसके हँसी के ठहाके छात्रावास मे गुँजा करते थे..किंतु अब तो जैसे शिशिर के होंठो पे कोई शब्द ही नही थे..हँसना तो दूर..उसको किसी ने मुस्कुराते भी नही देखा..

अनुमेहा के विवाह को अब १० दिन रह गये है..और शिशिर के भी विद्यालय की पढाई पूरी हो गयी है और अब उसे विश्‍वविद्यालय मे प्रवेश लेना है..जिसकी परीक्षा अनुमेहा के विवाह के ३ दिन पूर्व है..किंतु शिशिर को तो जाने क्या हो गया..और कोई समय होता तो वो रात दिन एक कर देता पड़ाई के लिए..किंतु अभी तो जैसे पुस्तके उसकी दुश्मन है..पड़ाई तो दूर वो उन पुस्तको को छूता भी नही है..उसे पता है अगर उसने इस बार विश्‍वविद्यालय मे प्रवेश नही लिया तो उसे साल भर फिर प्रतीक्षा करनी पड़ेगी..और उसका एक साल पूरा बेकार जाएगा..किंतु फिर भी जाने उसे क्या हो गया ..उसका पढाई मे बिल्कुल मन नही लगता है..वो रात दिन कुछ ना कुछ सोचता रहता..बीच बीच मे जब कभी आँखे गीली हो जाती तो धीरे से उनको पोंछ लेता..अजीब मानसिक द्वंद चल रहा है शिशिर के मस्तिष्क मे..दिन पे दिन ये द्वंद तीव्र ही होता जा रहा था..और साथ ही तीव्र होती जा रही थी उसके हृदय की व्याकुलता..किंतु उसे कोई समाधान नही मिल रहा था..

आज शिशिर बहोत देर तक सोता रहा..जब सोकर के उठा तो शाम हो गयी थी..वो आज कही नही गया..अपने कमरे मे ही बिस्तर पे पड़ा रहा..जब सोये-सोये मन उब गया तो जाके छत पे बैठ गया..हल्का-हल्का अंधेरा हो आया है..और आकाश मे चाँद सितारे दिखाने लगे है..उसे याद है ऐसी ही कितनी अनगिनत चाँदनी रातें उसने और मेहा ने साथ-साथ बिताई है..और ऐसी ही एक चाँदनी रात मे मेहा ने उसे..आसमान मे तारों की तरफ दिखाते हुए कहा था .."शिशिर तुम्हे एक सीधी रेखा मे वो तीन तारें दिख रहे है..दिख रहे है ना शिशिर"..(यदि आप लोग रात मे आसमान मे देखेंगे तो वो तीन तारे जो हमेशा एक साथ एक सीधे रेखा मे होते है..आप लोगो को दीख जाएंगे)
"हाँ मेहा"..शिशिर ने कहा.
"शिशिर तुम इनको कही से भी देखोगे ना तो ये तुमको हमेशा ऐसे ही साथ दिखेंगे..तो जब हम लोग नीकॅट भविष्य यदि कभी बीछड़ गये..और जब हम लोगो को एक दूसरे की बहोत याद आएगी ना तो हम लोग इनको देखेंगे...ये तारें हम लोगो को साथ होने का एहसास दिलाएँगे..जैसे ये हमेशा साथ होते है"..अनुमेहा ने कहा.

शिशिर के होंठो पे मुस्कुराहट आ गयी...और वो धीरे-धीरे गुनगुनाने लगा..
"तेरा मेरा प्यार अमर फिर क्यों मुझको लगता है डर
मेरे जीवन साथी बता दिल क्यों धड़के रह-रह कर"
यह वही गाना है जिसे अनुमेहा और शिशिर हमेशा साथ गुनगुनाते थे..और मेहा की आवाज़ मे तो शिशिर को ये गाना बहोत पसंद है..

अनुमेहा से मिले शिशिर को लगभग एक महीना हो गया है..और उसके बाद उन दोनो के बीच कोई बात-चीत भी नही हुई..और ना ही शिशिर अनुमेहा से मिलने ही जा सका..शुरू मे तो उसके विद्यालय की परीक्षा थी..तो वो अध्ययन मे व्यस्त रहता..और अनुमेहा की याद थोड़ी कम आती थी.. किंतु जब से उसकी परीक्षा समाप्त हुई है..उसको रात दिन सिर्फ़ अनुमेहा की ही याद आती है..जब-जब उसके मस्तिष्क मे ख़याल आता है की कुछ ही दिनो मे मेहा उससे बहोत दूर चली जाएगी..उसकी आँख भर आती है..और दिल बैठ जाता है..उसे बहोत ही तेज घबराहट होने लगती ..लगता जैसे जीवन मे अब कुछ बचा ही नही है..मन की स्पष्टता जैसे कही खो रही है..सब कुछ धुंधला हो रहा हैं..ऐसी मानसिक स्तिथि उसकी कभी नही रही है..

शिशिर के दिमाग़ मे हर चीज़ हमेशा स्पष्ट रहती थी..उसे आज के पहले कभी दुविधा नही हुई.. क्या करना है..क्या नही करना ..ये उसे बिल्कुल साफ पता होता था..क्या ग़लत है क्या सही है उसकी परिभाषा शिशिर से अच्छा कोई नही दे सकता था..किंतु शिशिर आज बिल्कुल नही समझ पा रहा है की क्या करे..जब ये निर्णय उसने खुद ही लिया की..उन्हे त्याग करना पड़ेगा..अनुमेहा ने भी जब उसके इस निर्णय का सम्मान किया ..उसे भी तो कितना कष्ट हुआ होगा किंतु उसने एक बार भी प्रतिरोध नही किया..तो फिर वो अब वो कमजोर क्यो पड़ रहा है..अजीब सी मानसिक स्तिथि हो गयी है उसकी..रात दिन चौबीसो घंटे सिर्फ़ उसके दिमाग़ मे एक ही बात घूमती रहती की कुछ दिनो मे मेहा चली जाएगी दूर बहोत दूर..

                                       ...........................

आज सुबह से ही हल्की हल्की बारिश हो रही है..और अनुमेहा अपने कमरे मे खिड़की पे बैठी है..उसका कमरा घर के पीछे के तरफ है..घर के पिछवाड़े एक छोटा सा लॉन है..जिसमे चारो तरफ विभिन्न रंगो के गुलाब लगे है..और बीच मे थोड़े थोड़े अंतराल पे रजनीगंधा के अनेक पौधे लगे थे..इनको दूर से देख कर लगता था जैसे धरती को किसी ने अनेक रंगो से रंगकर उसपे सफेद रंग छिड़क दिया..और एक तरफ कोने मे छुईमुई का छोटा सा पौधा है..जिसे शिशिर ने लगाया था..शिशिर जिस दिन ये पौधा लेके आया था साथ मे वो टेसू के फूल का भी एक पौधा लेके आया था और ..उसने टेसू के फूल का पौधा अनुमेहा के खिड़की के पास लगाया था और खूब खुश होकर कहा था " मेहा जब ये पौधा बड़ा होगा और जब इसकी टहनियाँ तुम्हारी खिड़की के पास तक आ जायेगी..तब इनको देखना..तुम्हे बहोत अच्छा लगेगा..और तुम्हे मेरे होने का एहसास होगा..और खिलखिला कर हसने लगा था"अनुमेहा बारिश मे भीगते उस टेसू के पेड़ को देखते हुए कहती है.."शिशिर तुम सही कहते थे सचमुच ये टेसू का पेड़ तुम्हारे होने का एहसास दिलाता है..फिर उसने उस छुईमुई के पौधे के देखा जो बारिश के कारण अपने आप मे सिमट के पड़ा है..शिशिर घंटो इस पौधे के पास बैठा रहता..और जब भी छुईमुई की पत्तियाँ विस्तृत होती वो उनको अपने हाथो से छू देता वो फिर से सिमट जाती..और वो खिलखिला के हॅस पड़ता था..अनुमेहा के होंठ हल्के से विस्तृत हो गये..उसने एक दीर्घ स्वॉश लिया ..और खिड़की पर से उठकर..आके कुर्सी पे बैठ गयी..और मेज पे पड़ी पुस्तक उठाकर उसके पन्ने पलटने लगी..

अनुमेहा इस बार स्नातक के अंतिम वर्ष मे है..और उसकी परीक्षा चल रही है..उसकी परीक्षा भी शिशिर के विश्‍वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा वाले दिन ही समाप्त हो रही है..किंतु पड़ने लिखने मे उसका कुछ ख़ास मन नही लगा रहा है..वो उठी और जाके बिस्तर पे लेट गयी..और इधर उधर की बातें सोचते हुए कब सो गयी पता ही नही चला..

अनुमेहा पहले से थोड़ी दुबली हो गयी है..खाने पीने मे भी उसका कुछ खास मन नही लगता है..किंतु इस बात का उस पूरे घर मे किसी को उसने एहसास नही होने दिया की वो दुखी है..उसने अपने स्वाभाव मे बिल्कुल भी परिवर्तन नही होने दिया है..वो अभी भी पूरे घर मे वैसे ही मुस्कुराते हुए घूमती थी..सबसे खुश होकर मिलती है..जैसे वो पहले रहा करती थी..अनुमेहा की स्तिथि और शिशिर की स्तिथि लगभग-लगभग एक जैसी है सिर्फ़ अंतर है तो इस बात का शिशिर को अभिनय नही करना है..वो जब चाहे रो सकता है ..दिन भर बिना मतलब के भटक सकता है..किंतु अनुमेहा ऐसा नही कर सकती है..उसे तो लोगो के सामने खुश रहना पड़ेगा..समय से हर काम करना पड़ेगा..खाने का मन हो या ना हो किंतु खाना पड़ेगा..अगर रोना आए भी तो उसको छुपाना पड़ेगा..

अनुमेहा के विवाह को अब कुछ ही दिन रह गये है..एक-एक करके उसके सारे सगे संबंधी आने शुरू हो गये है..उसके घर पे अब चहल-पहल बढ गयी है..झालर बत्ती वालो ने आके बत्तियाँ लगा दी हैं..एक तरफ कोने मे ढेर सारे पत्तल और पूरवे रखे हुए है..शामियाने वाले शामियाना लगाने के लिए उपयुक्त जगह तलाश रहे है..विवाह की तैयारियाँ जोरो पे है..खूब हँसी मज़ाक चल रहा है..सब लोग बहोत ख़ुश है..सिर्फ़ वही इंसान खुश नही है..जीसके लिए ये सब तैयारियाँ हो रही हैं..
कैसी अजीब बिडम्बना है..और कैस अजीब दुनिया है ये..जहा पे निर्जीव पत्तल पुरवों को प्राथमिकता मिलती है..सजीव और सवेदनशील हृदय कोई नही देखता है..

हिंदू धर्म एक ऐसा धर्म है..जहा पे विवाह को एक उत्सव की तरह मनाया जाता है..और इस उत्सव का अंतराल कम से कम दस दिन का तो होता ही है..ढेर सारे रीति-रिवाज और ढेर शारी रस्मे..ये शारी रस्मे हमारे पुर्वजो ने शायद इसलिए बनाई है की..धीरे-धीरे करके और इतने सारे रीति-रिवाजो से गुजर कर..आप को एहसास हो जाए की आप कुछ विशेष कर रहे है..की आपका ये नया रिश्ता अटूट बने..की आप मजबूत बने..की आप आप कुछ गंभीर ज़िम्मेदारियाँ आने वाली है और आप उसके लिए मानसिक और शारीरिक रूप से तैयार हो जाए..

अनुमेहा के भी विवाह की रस्मे शुरू हो गयी हैं..सुबह से लेकर रात तक गाना-बजाना..ढेर सारी पूजा-पाठ और अनेक तरह के अनगिनत प्रपंच..वो तो अनुमेहा को इन सब प्रपंचो मे उपस्तिथ रहना पड़ता ..किंतु उसकी परीक्षा चल रही थी..इसलिए उसको तभी बुलाया जाता जब उसकी ज़रूरत होती..अन्यथा वो अपने कमरे मे ही रहती..उस दिन भी देर रात तक रस्मो रिवाज चलते रहें..जब सब लोग खाली हुए तो रात के १० बज गये थे..सबने खाना खाया फिर अनुमेहा अपने कमरे मे आ गयी..और बिस्तर पे लेट गयी..और सोचने लगी..शिशिर सही कहता था की हमे सबके लिए त्याग करना पड़ेगा..आज सब लोग कितने उत्साह से उसके विवाह की तैयारियों मे लगे हुए हैं..कितना ही खुशनुमा माहौल है..हर तरफ हसी ठिठोली चल रही है..ये जो उसके माता-पिता को पूर्णता का एहसास दिला रहा है...जो उन्हे समाज मे एक उत्कृष्टता दिला रहा है की उनहोने ने अपनी ज़िम्मेदारी का निर्वाह बहोत ही अच्छे से किया..जो उनके चेहरे पे संतुष्टि का भाव है..वो इसी त्याग के कारण है..यदि मै और शिशिर इसकी परवाह नही करके कुछ भी अन्यथा करते तो क्या आज ये सब कुछ संभव था..और समाज की बात छोड़ दे तो क्या माँ और पिताजी के चेहरे पे इतनी संतुष्टि आती..

शिशिर मेरे प्राण तुमको कोटि-कोटि धन्यवाद ..तुमने मुझे बल दिया और मुझे कमजोर होने से बचा लिया.

आज चाँद पूर्णतया खिला हुआ है..चाँद की किरणे खिड़की से होके अनुमेहा के पलंग तक आ रही थी..अनुमेहा को जब लेटे-लेटे नींद नही आई तो वो आके खिड़की पे बैठ गयी..जिसपे वो और शिशिर हमेशा बैठा करते थे..जिसपे उन्होने ने ना जाने कितनी अनगिनत रातें साथ गुजारी है..

बाहर चारो तरफ चाँदनी बिखरी है..आकाश पूर्णतया स्वच्छ है..और अनगिनत असंख्य तारे जगमग-जगमग कर रहे है...अनुमेहा के चेहरे पे चाँदनी पड़ रही है..अन्य दिनो की तरह यदि शिशिर होता तो वो अनुमेहा को एकटक देखता रहता बिना पलके झपकाए बिना कुछ कहे..और फिर धीरे से अपने होंठ उसके कान के पास लाकर कहता है मेहा तुम बहोत सुंदर हो..और अनुमेहा धीरे से शरमा के कहती "धत्त..बुद्धू".. किंतु आज तो कोई नही है..सब कुछ वही है..वही चाँदनी, वही तारें, वही टेसू का पेड़ वही खिड़की..किंतु आज जैसे सब कुछ निर्जीव है..आज कोई नही है ये कहने वाला की मेहा तुम बहोत सुंदर हो..अनुमेहा की आँख भर आयी..

अक्तूबर का महीना पहाड़ो मे पतझड़ का महीना होता है..अक्तूबर मे पतझड़ शुरू होता है और नवम्बर के अंत तक सारे पेड़ो के पत्ते गिर जाते है..टेसू के पेड़ के भी सारे पत्ते गिर गये है..चाँदनी रात मे जब उसकी टहनियो पे चाँद की किरण पड़ती है तो उसकी डालियां चमकने लगती है..ऐसा लगता है जैसे किसी ने चाँदी का कोई पेड़ बना के खड़ा कर दिया हो..शिशिर देखो ये टेसू का पेड़ कितना सुंदर लग रहा है..काश तुम यहाँ होते ये देखने के लिए..फिर वो अपने हाथ घुटने पर रखकर और उनको मोड़ के बैठ गयी और आकाश की तरफ देखने लगी..और उन तीन तारों को देख के धीरे से कहा "तुम मेरे साथ हमेशा हो.."

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अब अनुमेहा के विवाह को तीन दिन रह गये है..और आज शिशिर और अनुमेहा दोनो की परीक्षा समाप्त हो गयी..उनकी परीक्षा कैसी हुई..?क्या शिशिर को विश्‍वविद्यालय मे प्रवेश मिलेगा..?क्या अनुमेहा के अच्छे अंक आएँगे..? ये ऐसे प्रश्न है जिनका उत्तर भविष्य की कहानियों मे मिलेगा..

आज अनुमेहा जल्दी से घर वापस आ गयी परीक्षा देकर...और आज वो सुबह से ही बहोत खुश है..क्योकि आज शिशिर जो आ रहा है..

शिशिर अनुमेहा के घर विवाह मे क्यो आ रहा है..क्या इससे किसी को आपत्ति नही होगी..अनुमेहा और शिशिर एक-दूसरे को कैसे जानते है..इन सारे प्रश्नो का उत्तर जानने के लिए..अगली कुछ कहानियो मे हम भूतकाल की बाते करेंगे..उस समय की बातें करेंगे जब शिशिर और अनुमेहा पहली बार मिले..जब वे अबोध और अंजान दुनिया की परिपक्वता से दूर..सिर्फ़ मासूम बच्चे थे...

Friday, December 25, 2009

इस बार कोई कहानी नही..मै ये जो लिख रहा हूँ ये मुझे शायद अनुमेहा और शिशिर की कहानी लिखने के पहले लिखना चाहिये था..
जब मैने शिशिर और अनुमेहा की कहानी लिखनी शुरू की थी.. तो मैने सोचा था एक छोटी सी कहानी लिखूंगा.. किंतु जब मैने आखरी पत्र लिखा तो मुझे लगा की मुझे और भी लिखना चाहिए..

मेरी-बात
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तो मै ये क्यो लिख रहा हूँ..??

ये मै लिख रहा हूँ कहानी की भूमिका स्पष्ट करने के लिए...

यह एक प्रेम कहानी है.. आप लोगो ने बहोत सारी प्रेम कहानियाँ पड़ी होंगी जिसमे नायक नायिका मिलते है..फिर प्रेम होता है..फिर सुखद सपने आते है फिर बातों और वादों के सिलसिले चलते है ..फिर सामाजिकता मुखर होती है..और फिर वियोग.. और वियोग के बाद क्या होता है..ये एक बड़ा प्रश्न है..

किंतु मेरी ये जो कहानी है इसका आरम्भ ही शिशिर और अनुमेहा के वियोग से होता ..अनुमेहा की शादी कही और हो जाती है ..उसके बाद शिशिर और अनुमेहा की मनोस्थिति कैसी होती है,उसके बाद शिशिर क्या करता है..क्या अनुमेहा अपनी ज़िम्मेदारियों का निर्वाह कर पाती है..क्या शिशिर अपने भविष्य का निर्माण कर पाता है..ऐसे बहोत सारे प्रश्नो का उत्तर आपको इस कहानी मे मिलेगा..

कोई रिश्ता मनुष्य को कितना उत्कृष्ट बना सकता है..ये उसकी कहानी..

किसी भी रिश्ते की सार्थकता तभी है ..जब उससे सभी को खुशी मिले..जब उससे आप सभी को जोड़ सके ..सिर्फ़ स्व की स्वार्थपूर्ति कभी भी किसी रिश्ते का उद्‍देश्य नही होनी चाहिए..यदि कोई रिश्ता सिर्फ़ स्व की स्वार्थपूर्ति करता है तो उससे क्षणिक सुख तो मिलेगा किंतु निकट भविष्य मे वो रिश्ता आपको कष्ट ही देगा.. ये बात शिशिर और अनुमेहा को बहोत अच्छे से पता थी..उन्होने समाज के लिए अपने प्रियजन के लिए और अपने रिश्ते के प्रेम की उत्कृष्टता के लिए त्याग किया..ये कहानी उनके इसी त्याग की है..

मिलना या नही मिलना ये तो नीयती है..किंतु यदि परमपिता ने आपको कुछ अमूल्य दिया है..तो आप उसका जीवन भर मूल्य करे ये बहोत ज़रूरी है..यदि आपने किसी से सच्चा प्रेम किया है तो वो जीवन भर आपके साथ रहेगा..जीवन के हर दोराहे पे आपको रास्ता दिखाएगा..इस कहानी मे भी शायद कुछ ऐसी ही बात करेंगे..

यदि आपने किसी से प्रेम किया और आप उससे नही मिल पाए तो तो सब कुछ समाप्त नही होता है..आपने उस रिश्ते से क्या सीखा..उस रिश्ते से मिले ज्ञान से आप अपना और दूसरो का जीवन कैसे उत्कृष्ट बनाते है..ये उसकी ही कहानी है..

शेष सभी बाते कहानी मे...

उस आखरी रात शिशिर ने अनुमेहा को मंगल-सूत्र दिया था और उसने एक कविता भी लिखी थी..इस बार पड़ने के लिए ये कविता...

मंगल-सूत्र
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मन की असीमित गहरायी से
हमने छोटे छोटे मोती चुने.
विशाल आकाश की परछाई से
ठंडी ठंडी पुरवाई चुनी.
चमकते सूरज की ज्योति निकाली
चाँद की शीतलता लेकर,
और तारों की झीलमीलता लेकर,
उपवन से कुछ पुष्प चुने,
और दोनो हाथो से कल्पना को बुने.
बीते दिनो की मधुर स्मृतियों को
और कभी ना भूलने वाली तिथियों को,
हमने मोतियों मे समाहित किया,
काले काले मोतियों को
चाँदी मे पिरोकार,
कल्पित - अकल्पित सपनों को
चमकते हुए बिन्दुओ मे सँजोकर,
हमने अपने अटूट रिश्ते सूत्र को
और घनिष्टता दी,
आँखो से झरने वाले आँसुओ से धुलकर,
हृदय की पीड़ा से गुथकर
हमने हमारे मंगल के लिए सूत्र तैयार किया,
और काँपते होंठो से
किंतु मानसिक दृढ़ता से युक्त
हाथो से तुम्हे मंगल-सूत्र दिया.