Thursday, January 7, 2010

विवाह के पूर्व

दूर सामने पर्वत के पीछे अब सूर्य छिपने लगा है.. कुछ देर पहेले जो आकाश मे लालिमा छाई थी वो अब अदृश्य होने लगी है..और हल्का-हल्का अंधेरा घिर आया है..किंतु शिशिर को इस बदलते हुए परिदृश्य का बिल्कुल भी आभाष नही है वो ना जाने कब से उसी पहाड़ी टीले पे अकेला और शांत बैठा है..जिसपे वो और अनुमेहा घंटो बैठ के अनगिनत बातें किया करते थे..वो एकटक सामने देखते जा रहा है बिना पलके झपकाए..उसे अभी भी याद है जब अनुमेहा उसे पहेली बार यहाँ लेकर आई थी.. और चहकते हुए बच्चो जैसी आवाज़ मे कहाँ था "शिशिर पता है मुझे ये जगह बहोत पसंद है..जब भी मै बहोत उदास होती हूँ..या बहोत खुश होती हूँ..तो यहाँ आ जाती हूँ..देखो ना कितनी शांति है यहाँ पे..नीचे कल-कल बहती नदी की आवाज़ कितनी मधुर लगती है..और दूर सामने पहाड़ो की ये हरियाली मन को कितना मोहित करने वाला दृश्य है..है ना शिशिर"..और गर्व से उसकी ओर देखने लगी..जैसे उसने किसी गुप्त खजाने की जानकारी दी हो शिशिर को..

और शिशिर के होंठो पे अनायास ही मुस्कुराहट आ गयी..और साथ ही उसकी आँखे भर आयी..आँख से आँसू की एक बूँद उसके हाथ पे गिरी तो उसका ध्यान टूटा..और उसने चारो तरफ देखा तो..आसमान मे तारें टिमटिमाने लगे थे..उसने धीरे धीरे अपने हाथों से अपने आँखो को पोछा..वो चुपचाप उठा और धीरे धीरे कदमो से छात्रावास की ओर लौटने लगा..छात्रावास लौट के वो बिस्तर पे चुपचाप लेट गया..खाने पीने की उसको कोई सुध नही है ..लेटे लेटे उसने मेहा का लिखा वो अंतिम पत्र खोला और पढने लगा..पढते-पढते उसकी आँख भर आयी और वो फूट-फूट के रोने लगा..वो बहोत देर तक रोता रहा..रोते रोते उसे कब नींद आ गयी..नही पता..अनुमेहा ने शिशिर को अनगिनत पत्र लिखे हैं..शिशिर आज कल रोज उन पत्रों को पढा करता है..पढते-पढते वो कभी मुस्कुरा उठता और कभी रोने लगता...

शिशिर की रोज की यही दिनचर्या है..वो जब भी सोकर उठता..या तो अपने कमरे मे बिस्तर पे पड़ा रहता..या फिर छात्रावास के बाहर यहाँ-वहाँ दिन भर भटकता रहता..और या तो फिर उस पहाड़ी टीले पे जाके बैठ जाता..देर रात को छात्रावास लौटता..कुछ खाने का मन करता तो ख़ाता नही तो जाके बिस्तर पे चुपचाप लेट जाता..और यदि नींद नही आती तो फिर जाके छत पे बैठा रहता..किसी से कोई बात नही करता..दिन भर उदास और गुमसुम पड़ा रहता है.. पूरे छात्रावास मे हर किसी के होंठो पे सिर्फ़ इसी बात की चर्चा है की शिशिर को क्या हो गया है..क्योकि शिशिर का स्वाभाव बड़ा ही चंचल हसमुख और मिलनसार था ..दिनभर उसके हँसी के ठहाके छात्रावास मे गुँजा करते थे..किंतु अब तो जैसे शिशिर के होंठो पे कोई शब्द ही नही थे..हँसना तो दूर..उसको किसी ने मुस्कुराते भी नही देखा..

अनुमेहा के विवाह को अब १० दिन रह गये है..और शिशिर के भी विद्यालय की पढाई पूरी हो गयी है और अब उसे विश्‍वविद्यालय मे प्रवेश लेना है..जिसकी परीक्षा अनुमेहा के विवाह के ३ दिन पूर्व है..किंतु शिशिर को तो जाने क्या हो गया..और कोई समय होता तो वो रात दिन एक कर देता पड़ाई के लिए..किंतु अभी तो जैसे पुस्तके उसकी दुश्मन है..पड़ाई तो दूर वो उन पुस्तको को छूता भी नही है..उसे पता है अगर उसने इस बार विश्‍वविद्यालय मे प्रवेश नही लिया तो उसे साल भर फिर प्रतीक्षा करनी पड़ेगी..और उसका एक साल पूरा बेकार जाएगा..किंतु फिर भी जाने उसे क्या हो गया ..उसका पढाई मे बिल्कुल मन नही लगता है..वो रात दिन कुछ ना कुछ सोचता रहता..बीच बीच मे जब कभी आँखे गीली हो जाती तो धीरे से उनको पोंछ लेता..अजीब मानसिक द्वंद चल रहा है शिशिर के मस्तिष्क मे..दिन पे दिन ये द्वंद तीव्र ही होता जा रहा था..और साथ ही तीव्र होती जा रही थी उसके हृदय की व्याकुलता..किंतु उसे कोई समाधान नही मिल रहा था..

आज शिशिर बहोत देर तक सोता रहा..जब सोकर के उठा तो शाम हो गयी थी..वो आज कही नही गया..अपने कमरे मे ही बिस्तर पे पड़ा रहा..जब सोये-सोये मन उब गया तो जाके छत पे बैठ गया..हल्का-हल्का अंधेरा हो आया है..और आकाश मे चाँद सितारे दिखाने लगे है..उसे याद है ऐसी ही कितनी अनगिनत चाँदनी रातें उसने और मेहा ने साथ-साथ बिताई है..और ऐसी ही एक चाँदनी रात मे मेहा ने उसे..आसमान मे तारों की तरफ दिखाते हुए कहा था .."शिशिर तुम्हे एक सीधी रेखा मे वो तीन तारें दिख रहे है..दिख रहे है ना शिशिर"..(यदि आप लोग रात मे आसमान मे देखेंगे तो वो तीन तारे जो हमेशा एक साथ एक सीधे रेखा मे होते है..आप लोगो को दीख जाएंगे)
"हाँ मेहा"..शिशिर ने कहा.
"शिशिर तुम इनको कही से भी देखोगे ना तो ये तुमको हमेशा ऐसे ही साथ दिखेंगे..तो जब हम लोग नीकॅट भविष्य यदि कभी बीछड़ गये..और जब हम लोगो को एक दूसरे की बहोत याद आएगी ना तो हम लोग इनको देखेंगे...ये तारें हम लोगो को साथ होने का एहसास दिलाएँगे..जैसे ये हमेशा साथ होते है"..अनुमेहा ने कहा.

शिशिर के होंठो पे मुस्कुराहट आ गयी...और वो धीरे-धीरे गुनगुनाने लगा..
"तेरा मेरा प्यार अमर फिर क्यों मुझको लगता है डर
मेरे जीवन साथी बता दिल क्यों धड़के रह-रह कर"
यह वही गाना है जिसे अनुमेहा और शिशिर हमेशा साथ गुनगुनाते थे..और मेहा की आवाज़ मे तो शिशिर को ये गाना बहोत पसंद है..

अनुमेहा से मिले शिशिर को लगभग एक महीना हो गया है..और उसके बाद उन दोनो के बीच कोई बात-चीत भी नही हुई..और ना ही शिशिर अनुमेहा से मिलने ही जा सका..शुरू मे तो उसके विद्यालय की परीक्षा थी..तो वो अध्ययन मे व्यस्त रहता..और अनुमेहा की याद थोड़ी कम आती थी.. किंतु जब से उसकी परीक्षा समाप्त हुई है..उसको रात दिन सिर्फ़ अनुमेहा की ही याद आती है..जब-जब उसके मस्तिष्क मे ख़याल आता है की कुछ ही दिनो मे मेहा उससे बहोत दूर चली जाएगी..उसकी आँख भर आती है..और दिल बैठ जाता है..उसे बहोत ही तेज घबराहट होने लगती ..लगता जैसे जीवन मे अब कुछ बचा ही नही है..मन की स्पष्टता जैसे कही खो रही है..सब कुछ धुंधला हो रहा हैं..ऐसी मानसिक स्तिथि उसकी कभी नही रही है..

शिशिर के दिमाग़ मे हर चीज़ हमेशा स्पष्ट रहती थी..उसे आज के पहले कभी दुविधा नही हुई.. क्या करना है..क्या नही करना ..ये उसे बिल्कुल साफ पता होता था..क्या ग़लत है क्या सही है उसकी परिभाषा शिशिर से अच्छा कोई नही दे सकता था..किंतु शिशिर आज बिल्कुल नही समझ पा रहा है की क्या करे..जब ये निर्णय उसने खुद ही लिया की..उन्हे त्याग करना पड़ेगा..अनुमेहा ने भी जब उसके इस निर्णय का सम्मान किया ..उसे भी तो कितना कष्ट हुआ होगा किंतु उसने एक बार भी प्रतिरोध नही किया..तो फिर वो अब वो कमजोर क्यो पड़ रहा है..अजीब सी मानसिक स्तिथि हो गयी है उसकी..रात दिन चौबीसो घंटे सिर्फ़ उसके दिमाग़ मे एक ही बात घूमती रहती की कुछ दिनो मे मेहा चली जाएगी दूर बहोत दूर..

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आज सुबह से ही हल्की हल्की बारिश हो रही है..और अनुमेहा अपने कमरे मे खिड़की पे बैठी है..उसका कमरा घर के पीछे के तरफ है..घर के पिछवाड़े एक छोटा सा लॉन है..जिसमे चारो तरफ विभिन्न रंगो के गुलाब लगे है..और बीच मे थोड़े थोड़े अंतराल पे रजनीगंधा के अनेक पौधे लगे थे..इनको दूर से देख कर लगता था जैसे धरती को किसी ने अनेक रंगो से रंगकर उसपे सफेद रंग छिड़क दिया..और एक तरफ कोने मे छुईमुई का छोटा सा पौधा है..जिसे शिशिर ने लगाया था..शिशिर जिस दिन ये पौधा लेके आया था साथ मे वो टेसू के फूल का भी एक पौधा लेके आया था और ..उसने टेसू के फूल का पौधा अनुमेहा के खिड़की के पास लगाया था और खूब खुश होकर कहा था " मेहा जब ये पौधा बड़ा होगा और जब इसकी टहनियाँ तुम्हारी खिड़की के पास तक आ जायेगी..तब इनको देखना..तुम्हे बहोत अच्छा लगेगा..और तुम्हे मेरे होने का एहसास होगा..और खिलखिला कर हसने लगा था"अनुमेहा बारिश मे भीगते उस टेसू के पेड़ को देखते हुए कहती है.."शिशिर तुम सही कहते थे सचमुच ये टेसू का पेड़ तुम्हारे होने का एहसास दिलाता है..फिर उसने उस छुईमुई के पौधे के देखा जो बारिश के कारण अपने आप मे सिमट के पड़ा है..शिशिर घंटो इस पौधे के पास बैठा रहता..और जब भी छुईमुई की पत्तियाँ विस्तृत होती वो उनको अपने हाथो से छू देता वो फिर से सिमट जाती..और वो खिलखिला के हॅस पड़ता था..अनुमेहा के होंठ हल्के से विस्तृत हो गये..उसने एक दीर्घ स्वॉश लिया ..और खिड़की पर से उठकर..आके कुर्सी पे बैठ गयी..और मेज पे पड़ी पुस्तक उठाकर उसके पन्ने पलटने लगी..

अनुमेहा इस बार स्नातक के अंतिम वर्ष मे है..और उसकी परीक्षा चल रही है..उसकी परीक्षा भी शिशिर के विश्‍वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा वाले दिन ही समाप्त हो रही है..किंतु पड़ने लिखने मे उसका कुछ ख़ास मन नही लगा रहा है..वो उठी और जाके बिस्तर पे लेट गयी..और इधर उधर की बातें सोचते हुए कब सो गयी पता ही नही चला..

अनुमेहा पहले से थोड़ी दुबली हो गयी है..खाने पीने मे भी उसका कुछ खास मन नही लगता है..किंतु इस बात का उस पूरे घर मे किसी को उसने एहसास नही होने दिया की वो दुखी है..उसने अपने स्वाभाव मे बिल्कुल भी परिवर्तन नही होने दिया है..वो अभी भी पूरे घर मे वैसे ही मुस्कुराते हुए घूमती थी..सबसे खुश होकर मिलती है..जैसे वो पहले रहा करती थी..अनुमेहा की स्तिथि और शिशिर की स्तिथि लगभग-लगभग एक जैसी है सिर्फ़ अंतर है तो इस बात का शिशिर को अभिनय नही करना है..वो जब चाहे रो सकता है ..दिन भर बिना मतलब के भटक सकता है..किंतु अनुमेहा ऐसा नही कर सकती है..उसे तो लोगो के सामने खुश रहना पड़ेगा..समय से हर काम करना पड़ेगा..खाने का मन हो या ना हो किंतु खाना पड़ेगा..अगर रोना आए भी तो उसको छुपाना पड़ेगा..

अनुमेहा के विवाह को अब कुछ ही दिन रह गये है..एक-एक करके उसके सारे सगे संबंधी आने शुरू हो गये है..उसके घर पे अब चहल-पहल बढ गयी है..झालर बत्ती वालो ने आके बत्तियाँ लगा दी हैं..एक तरफ कोने मे ढेर सारे पत्तल और पूरवे रखे हुए है..शामियाने वाले शामियाना लगाने के लिए उपयुक्त जगह तलाश रहे है..विवाह की तैयारियाँ जोरो पे है..खूब हँसी मज़ाक चल रहा है..सब लोग बहोत ख़ुश है..सिर्फ़ वही इंसान खुश नही है..जीसके लिए ये सब तैयारियाँ हो रही हैं..
कैसी अजीब बिडम्बना है..और कैस अजीब दुनिया है ये..जहा पे निर्जीव पत्तल पुरवों को प्राथमिकता मिलती है..सजीव और सवेदनशील हृदय कोई नही देखता है..

हिंदू धर्म एक ऐसा धर्म है..जहा पे विवाह को एक उत्सव की तरह मनाया जाता है..और इस उत्सव का अंतराल कम से कम दस दिन का तो होता ही है..ढेर सारे रीति-रिवाज और ढेर शारी रस्मे..ये शारी रस्मे हमारे पुर्वजो ने शायद इसलिए बनाई है की..धीरे-धीरे करके और इतने सारे रीति-रिवाजो से गुजर कर..आप को एहसास हो जाए की आप कुछ विशेष कर रहे है..की आपका ये नया रिश्ता अटूट बने..की आप मजबूत बने..की आप आप कुछ गंभीर ज़िम्मेदारियाँ आने वाली है और आप उसके लिए मानसिक और शारीरिक रूप से तैयार हो जाए..

अनुमेहा के भी विवाह की रस्मे शुरू हो गयी हैं..सुबह से लेकर रात तक गाना-बजाना..ढेर सारी पूजा-पाठ और अनेक तरह के अनगिनत प्रपंच..वो तो अनुमेहा को इन सब प्रपंचो मे उपस्तिथ रहना पड़ता ..किंतु उसकी परीक्षा चल रही थी..इसलिए उसको तभी बुलाया जाता जब उसकी ज़रूरत होती..अन्यथा वो अपने कमरे मे ही रहती..उस दिन भी देर रात तक रस्मो रिवाज चलते रहें..जब सब लोग खाली हुए तो रात के १० बज गये थे..सबने खाना खाया फिर अनुमेहा अपने कमरे मे आ गयी..और बिस्तर पे लेट गयी..और सोचने लगी..शिशिर सही कहता था की हमे सबके लिए त्याग करना पड़ेगा..आज सब लोग कितने उत्साह से उसके विवाह की तैयारियों मे लगे हुए हैं..कितना ही खुशनुमा माहौल है..हर तरफ हसी ठिठोली चल रही है..ये जो उसके माता-पिता को पूर्णता का एहसास दिला रहा है...जो उन्हे समाज मे एक उत्कृष्टता दिला रहा है की उनहोने ने अपनी ज़िम्मेदारी का निर्वाह बहोत ही अच्छे से किया..जो उनके चेहरे पे संतुष्टि का भाव है..वो इसी त्याग के कारण है..यदि मै और शिशिर इसकी परवाह नही करके कुछ भी अन्यथा करते तो क्या आज ये सब कुछ संभव था..और समाज की बात छोड़ दे तो क्या माँ और पिताजी के चेहरे पे इतनी संतुष्टि आती..

शिशिर मेरे प्राण तुमको कोटि-कोटि धन्यवाद ..तुमने मुझे बल दिया और मुझे कमजोर होने से बचा लिया.

आज चाँद पूर्णतया खिला हुआ है..चाँद की किरणे खिड़की से होके अनुमेहा के पलंग तक आ रही थी..अनुमेहा को जब लेटे-लेटे नींद नही आई तो वो आके खिड़की पे बैठ गयी..जिसपे वो और शिशिर हमेशा बैठा करते थे..जिसपे उन्होने ने ना जाने कितनी अनगिनत रातें साथ गुजारी है..

बाहर चारो तरफ चाँदनी बिखरी है..आकाश पूर्णतया स्वच्छ है..और अनगिनत असंख्य तारे जगमग-जगमग कर रहे है...अनुमेहा के चेहरे पे चाँदनी पड़ रही है..अन्य दिनो की तरह यदि शिशिर होता तो वो अनुमेहा को एकटक देखता रहता बिना पलके झपकाए बिना कुछ कहे..और फिर धीरे से अपने होंठ उसके कान के पास लाकर कहता है मेहा तुम बहोत सुंदर हो..और अनुमेहा धीरे से शरमा के कहती "धत्त..बुद्धू".. किंतु आज तो कोई नही है..सब कुछ वही है..वही चाँदनी, वही तारें, वही टेसू का पेड़ वही खिड़की..किंतु आज जैसे सब कुछ निर्जीव है..आज कोई नही है ये कहने वाला की मेहा तुम बहोत सुंदर हो..अनुमेहा की आँख भर आयी..

अक्तूबर का महीना पहाड़ो मे पतझड़ का महीना होता है..अक्तूबर मे पतझड़ शुरू होता है और नवम्बर के अंत तक सारे पेड़ो के पत्ते गिर जाते है..टेसू के पेड़ के भी सारे पत्ते गिर गये है..चाँदनी रात मे जब उसकी टहनियो पे चाँद की किरण पड़ती है तो उसकी डालियां चमकने लगती है..ऐसा लगता है जैसे किसी ने चाँदी का कोई पेड़ बना के खड़ा कर दिया हो..शिशिर देखो ये टेसू का पेड़ कितना सुंदर लग रहा है..काश तुम यहाँ होते ये देखने के लिए..फिर वो अपने हाथ घुटने पर रखकर और उनको मोड़ के बैठ गयी और आकाश की तरफ देखने लगी..और उन तीन तारों को देख के धीरे से कहा "तुम मेरे साथ हमेशा हो.."

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अब अनुमेहा के विवाह को तीन दिन रह गये है..और आज शिशिर और अनुमेहा दोनो की परीक्षा समाप्त हो गयी..उनकी परीक्षा कैसी हुई..?क्या शिशिर को विश्‍वविद्यालय मे प्रवेश मिलेगा..?क्या अनुमेहा के अच्छे अंक आएँगे..? ये ऐसे प्रश्न है जिनका उत्तर भविष्य की कहानियों मे मिलेगा..

आज अनुमेहा जल्दी से घर वापस आ गयी परीक्षा देकर...और आज वो सुबह से ही बहोत खुश है..क्योकि आज शिशिर जो आ रहा है..

शिशिर अनुमेहा के घर विवाह मे क्यो आ रहा है..क्या इससे किसी को आपत्ति नही होगी..अनुमेहा और शिशिर एक-दूसरे को कैसे जानते है..इन सारे प्रश्नो का उत्तर जानने के लिए..अगली कुछ कहानियो मे हम भूतकाल की बाते करेंगे..उस समय की बातें करेंगे जब शिशिर और अनुमेहा पहली बार मिले..जब वे अबोध और अंजान दुनिया की परिपक्वता से दूर..सिर्फ़ मासूम बच्चे थे...

Friday, December 25, 2009

इस बार कोई कहानी नही..मै ये जो लिख रहा हूँ ये मुझे शायद अनुमेहा और शिशिर की कहानी लिखने के पहले लिखना चाहिये था..
जब मैने शिशिर और अनुमेहा की कहानी लिखनी शुरू की थी.. तो मैने सोचा था एक छोटी सी कहानी लिखूंगा.. किंतु जब मैने आखरी पत्र लिखा तो मुझे लगा की मुझे और भी लिखना चाहिए..

मेरी-बात
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तो मै ये क्यो लिख रहा हूँ..??

ये मै लिख रहा हूँ कहानी की भूमिका स्पष्ट करने के लिए...

यह एक प्रेम कहानी है.. आप लोगो ने बहोत सारी प्रेम कहानियाँ पड़ी होंगी जिसमे नायक नायिका मिलते है..फिर प्रेम होता है..फिर सुखद सपने आते है फिर बातों और वादों के सिलसिले चलते है ..फिर सामाजिकता मुखर होती है..और फिर वियोग.. और वियोग के बाद क्या होता है..ये एक बड़ा प्रश्न है..

किंतु मेरी ये जो कहानी है इसका आरम्भ ही शिशिर और अनुमेहा के वियोग से होता ..अनुमेहा की शादी कही और हो जाती है ..उसके बाद शिशिर और अनुमेहा की मनोस्थिति कैसी होती है,उसके बाद शिशिर क्या करता है..क्या अनुमेहा अपनी ज़िम्मेदारियों का निर्वाह कर पाती है..क्या शिशिर अपने भविष्य का निर्माण कर पाता है..ऐसे बहोत सारे प्रश्नो का उत्तर आपको इस कहानी मे मिलेगा..

कोई रिश्ता मनुष्य को कितना उत्कृष्ट बना सकता है..ये उसकी कहानी..

किसी भी रिश्ते की सार्थकता तभी है ..जब उससे सभी को खुशी मिले..जब उससे आप सभी को जोड़ सके ..सिर्फ़ स्व की स्वार्थपूर्ति कभी भी किसी रिश्ते का उद्‍देश्य नही होनी चाहिए..यदि कोई रिश्ता सिर्फ़ स्व की स्वार्थपूर्ति करता है तो उससे क्षणिक सुख तो मिलेगा किंतु निकट भविष्य मे वो रिश्ता आपको कष्ट ही देगा.. ये बात शिशिर और अनुमेहा को बहोत अच्छे से पता थी..उन्होने समाज के लिए अपने प्रियजन के लिए और अपने रिश्ते के प्रेम की उत्कृष्टता के लिए त्याग किया..ये कहानी उनके इसी त्याग की है..

मिलना या नही मिलना ये तो नीयती है..किंतु यदि परमपिता ने आपको कुछ अमूल्य दिया है..तो आप उसका जीवन भर मूल्य करे ये बहोत ज़रूरी है..यदि आपने किसी से सच्चा प्रेम किया है तो वो जीवन भर आपके साथ रहेगा..जीवन के हर दोराहे पे आपको रास्ता दिखाएगा..इस कहानी मे भी शायद कुछ ऐसी ही बात करेंगे..

यदि आपने किसी से प्रेम किया और आप उससे नही मिल पाए तो तो सब कुछ समाप्त नही होता है..आपने उस रिश्ते से क्या सीखा..उस रिश्ते से मिले ज्ञान से आप अपना और दूसरो का जीवन कैसे उत्कृष्ट बनाते है..ये उसकी ही कहानी है..

शेष सभी बाते कहानी मे...

उस आखरी रात शिशिर ने अनुमेहा को मंगल-सूत्र दिया था और उसने एक कविता भी लिखी थी..इस बार पड़ने के लिए ये कविता...

मंगल-सूत्र
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मन की असीमित गहरायी से
हमने छोटे छोटे मोती चुने.
विशाल आकाश की परछाई से
ठंडी ठंडी पुरवाई चुनी.
चमकते सूरज की ज्योति निकाली
चाँद की शीतलता लेकर,
और तारों की झीलमीलता लेकर,
उपवन से कुछ पुष्प चुने,
और दोनो हाथो से कल्पना को बुने.
बीते दिनो की मधुर स्मृतियों को
और कभी ना भूलने वाली तिथियों को,
हमने मोतियों मे समाहित किया,
काले काले मोतियों को
चाँदी मे पिरोकार,
कल्पित - अकल्पित सपनों को
चमकते हुए बिन्दुओ मे सँजोकर,
हमने अपने अटूट रिश्ते सूत्र को
और घनिष्टता दी,
आँखो से झरने वाले आँसुओ से धुलकर,
हृदय की पीड़ा से गुथकर
हमने हमारे मंगल के लिए सूत्र तैयार किया,
और काँपते होंठो से
किंतु मानसिक दृढ़ता से युक्त
हाथो से तुम्हे मंगल-सूत्र दिया.

Monday, November 23, 2009

आखरी पत्र

उस आखरी रात को ये निर्णय हुआ की अनुमेहा वो विवाह करेगी उसके बाद शिशिर और अनुमेहा एक दूसरे से फिर कभी मिले या नही ये तो रहस्य का विषय है..और इस रहस्य का अनावरण भविष्य मे होगा.. किंतु..उसके बाद उन्होने एक दूसरे को विवाह के पहले एक पत्र लिखा.. उनका लिखा ये आखरी पत्र ही इस बार की कहानी है....


आखरी पत्र ( अनुमेहा)
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मेरे देवता,
कितने ही अनगिनत पत्र मैने तुमको लिखे ....आज शायद ये अंतिम हो.
तुम तो जानते हो हमेशा ही अनगिनत बातें होती है तुम्हे बताने के लिए किंतु ...सोच रही हूँ कहाँ से शुरू करू...??

याद है तुम्हे वो पिछली सर्दिया जब तुम दो महीने घर नही आए थे ..और मुझे बुखार हो आया था..
तब तुम्हारी कितनी याद आयी थी...और जब तुम दो महीने बाद आए तो तुम्हे देख के मै तो रोने ही लगी थी . तुमको याद है ना शिशिर..??

लेकिन पता है शिशिर अब रोना नही आता..तुम्हारी बहोत याद आती है फिर भी रोना नही आता है..
कितने दिन हो गये तुमको देखे हुए...क्या हम अब कभी नही मिलेंगे शिशिर...???


उस आखरी रात तुमने कहा की मुझे ये विवाह करना ही होगा...और मैने कोई प्रतिरोध नही किया...मैने तुम्हारे कहे का कभी प्रतिरोध किया है क्या शिशिर..??

किंतु मेरे जीवन के सुकुमार स्वप्न मुझे ये तो बताओ की अगर ये तन मै उसको दे भी दू ..किंतु ये आत्मा तो तुम्हारी ही रहेगी ना ...ये तो अब और किसी की कभी हो ही नही सकती...तो क्या ये उससे अन्याय नही होगा..बोलो शिशिर..??

परीक्षा के इन आख़िरी क्षणो मे मै कमजोर नही पड़ना चाहती...मै तुमको दुखी और परेशान भी नही करना चाहती..
किंतु मेरे देवता ...हमने जो पवित्र भविष्य के सपने देखे थे .वो क्या सिर्फ़ दिवा स्वप्न थे.??हमने स्वर्ग लोक मे बैठ के जो आत्मा के संगीत सुने थे ...वो क्या सिर्फ़ भौतिक सुरो की तान थी...??

मेरे प्राण हमने एक अनाम रिश्ते का पौधा लगाया..और उसको प्रेम की अनगिनत जल धारा से सिंचित किया…अनगिनत तूफान आए ...अनंत झंझावत आए ...किंतु हमने इस पौधे को कभी टूटने नही दिया..कभी सूखने नही दिया.. हमने हमेशा इस रिश्ते को सहेजा है ..जैसे हृदय मे यादों को सहेजते है....तो अब बोलो शिशिर क्या उस पौधे को जो अब पेड़ बन गया है सूखने दे..और क्या उन सहेज़ी हुई यादों को बिसार दे जैसे कभी कुछ था ही नही..??

मेरे आधार ..चलो मै हर एक बात विस्मृत कर देती हूँ..तुम्हारी हर बात मान लेती हूँ..कर्तव्यो के लिए चलो हमारे प्रेम की आहुति देती हूँ..किंतु मै आम्रपाली (आम्रपाली उनके कल्पित बेटी का नाम है..की यदि कभी उनकी शादी होती तो..अपने बच्चे का नाम वो आम्रपाली रखते) को कैसे विस्मृत कर दू..कैसे ये स्वीकार कर लू की वो हमारे भूत की सिर्फ़ एक कल्पना है..की वो कभी अस्तित्व मे नही आएगी..जिसको हमने रिश्ते मे हर क्षण जीया है..जिसको हमने उन अनगिनत रातो मे महसूस किया है..प्रेम के उन पवित्र क्षणो मे जिसको हमने परमपिता से माँगा है..जो हमारे आत्मा के साथ रची बसी..तुम बोलो शिशिर मै उसको कैसे विस्मृत कर दू..???

तुम्हारी बहोत याद आती है..तुमको भी तो मेरी याद आती होगी ना शिशिर...???

अब और क्या कहूँ शिशिर..पता है अब चाँद की किरणे शीतल नही लगती ..और जब भी ये ख़याल मन मे आता है की अब तुम्हारी आँखो से मै चाँद नही देख पाऊँगी ..मेरा हृदय उदास हो जाता है...किंतु तुम बिल्कुल चिंतित नही होना मेरे प्राण
ये छणिक कमज़ोरी है..तुम्हारी मेहा तुम्हारे आदर्शो को कभी हारने नही देगी..

अच्छे से रहना..और सदा अपने सदगुणों के सुगंध से संसार को सुवासित करते रहना.


तुम्हारी और सिर्फ़ तुम्हारी
मेहा






आखरी पत्र(शिशिर)
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मेरे भाग्य,
तुम्हारे ये अनगिनत प्रश्‍न ...मै क्या उत्तर दूँ...
तुम हमेशा मेरा आत्मबल रही हो....क्या बिना तुम्हारे सहयोग के ये संभव था..क्या इतना महत्वपूर्ण निर्णय मै कभी अकेले ले पता..??

मेरे सुख दुख के साथी तुम ये मत सोचना की तुम्हारे जाने के बाद तुम्हारा ये शिशिर अकेला हो जाएगा...साँस से प्राण की तरह..पुष्प से गंध की तरह तुम इस आत्मा मे रची बसी हो..तुम मुझसे कभी अलग नही हो रही हो..और कभी अलग होगी भी नही...तुम हर छड़ मेरे साथ हो..मेहा ..

मेरे जीवन की अमूल्य निधि तुम बिल्कुल भी चिंतित नही होना.. ये तो हमारे भौतिक जगत की कुछ ज़िम्मेदारियाँ है जिनका हम निर्वाह कर रहे है ..इस समाज के लिए अपने परिवार के लिए और जन्मो जन्मो से चली आ रही मान्यताओं के लिए हम त्याग कर रहे है..मेहा ये सिर्फ़ भौतिक वियोग है..हमारा रिश्ता तो आत्मिक है...जो अदृश्य और अटूट जीवन सूत्र से बना है..

मेहा तुमने पत्र मे लिखा था की शिशिर मै आम्रपाली को कैसे भूला दूँ.. मेहा तुमने एकदम सत्य कहा हम लोग आम्रपाली को कभी भी नही भूल सकते ..जो हमारे रिश्ते की एक मात्र इच्छा ..हमारा एक मात्र सपना थी...बस ये समझ लो मेहा..की इंसान के जीवन की हर इच्छा और हर सपने पूरे नही होते है..

मेहा तुमने जीतनी बातें अपने पत्र मे कही है सब सत्य है..मेहा हम मिले ..हमने एक पवित्र रिश्ता बनाया ...हमने उसको अनगिनत चाँद तारों से सजाया..अनगिनत फूलों से महकाया...कितनी दुविधा हुई ..कितनी असुविधा हुई ..किंतु हमने एक दूसरे का साथ कभी नही छोड़ा...जीतनी ठोकरे लगी ..हम और उतनी ही घनिष्ठता से जुड़ते गये..
मेहा हम एक दूसरे का साथ आज भी नही छोड़ रहे है..मेहा हम दूर हो रहे है ...अलग नही.

मेहा तुमने लिखा था ..शिशिर उन यादों को कैसे भूला दूँ ..मेहा कुछ भी भूलना नही ...मेहा सिर्फ़ ये फ़र्क समझना है की ..
कर्तव्य क्या है..और सौन्दर्य क्या है..मेहा ये जो हमारी दुनिया है ये बड़ी ही नाज़ुक मुलायम सौन्दर्य की दुनिया है..जिसको हमने प्रेम से अपने हृदय की अनंत गहराइयों मे सहेजा है.. जिसको यदि हमने प्रेम से नही सहेजा..तो वो तुरंत बिखर जाएगी....और मेहा फिर हम भी बिखर जाएँगे..इसलिए मेहा सौन्दर्य की दुनिया..आत्मा की दुनिया है..
इसको भौतिक जगत से नही मिलाना है..

जो... कर्तव्यो की दुनिया है ..वो भौतिक जगत की दुनिया है...जो अत्यंत कठोर है..यहाँ मन कोई नही देखता है ..यहाँ सिर्फ़ कर्तव्य का महत्व है..तो मेहा कर्तव्य अलग है सौन्द्र्य अलग है ..इस बात का हमेशा ध्यान देना है.

और क्या कहूँ मेरे आराध्य..तुम्हारे बिना इस जीवन की कल्पना भी संभव नही है..जब भी ये सोचता हूँ..की तुम जा रही हो
मन उदास हो जाता है..आँख भर जाती है..हृदय का स्पंदन मंद पड़ जाता है..तुम तो जानती हो ना मेहा जब मुझे घबराहट होती है तो मेरे दिल की धड़कने..धीमी हो जाती है...

मेहा सच मे तुम्हारी बहोत याद आती है...और चाँद की किरण अब मुझे भी शीतल नही लगती है..

अच्छे से रहना...



अनंतकाल से सिर्फ़ तुम्हारा
शिशिर

Wednesday, November 11, 2009

आखरी रात

आखरी रात
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याद है मेहा जब हम पहेली बार मिले थे ...
हूँ.......

तारो से सजी चाँदनी रात है,और कोई दिन होता तो ये रात बड़ी ही कोमल और मुलायम उन अनगिनत प्रेम भरी रातों की तरह होती किंतु आज तो सिर्फ़ खामोशी है जैसे सब कुछ रुक सा गया हो. उन दोनो के बीच कितनी बातें रहेती थी कितनी ही अनगिनत रातें ख़त्म हुई किंतु बातें नही, किंतु आज तो जैसे शब्द ही खो गये है आज सिर्फ़ खामोशी है.रात के एक बज रहे है,चारो तरफ सन्नाटा पसरा है,सब लोग सो रहे है बस ये दो जीव है जीनकी आँखो मे नींद नही है.

शिशिर ने फिर से कहा, मेहा याद है ना जब हम पहेली बार मिले थे...
अनुमेहा: हाँ ...(होंठ काँप रहे थे)

मेहा ने शिशिर का हाथ अपने हाथ मे ले करके कहा मुझे किसी और से शादी नही करनी है.
शिशिर ने कोई उत्तर नही दिया....
शिशिर तुम सुन रहे हो ..मुझे किसी और से शादी नही करनी है ...
शिशिर ने मेहा का चेहरा अपने हाथो मे लेके उसकी आखों मे देखा...
और किसी ने कुछ नही बोला ...दोनो खामोश रहे बहोत देर तक.....
फिर शिशिर ने बोला:"मेहा...मेहा...तुम्हे पता है तुम मुझे जितना प्यार करती हो उतना कोई किसी को नही करेगा...उतना प्यार तो मै भी नही कर पाया कभी...किसी के अंदर उतनी सामर्थ्य नही है. प्यार क्या होता है ये हमने तुमसे ही सीखा है..
तुम्हे याद है मेहा एक बार तुमने कहा था की ये जो हमारा प्यार है ये हमारी अपनी दुनिया है..हमारे अंदर की दुनिया..और एक बाहर की दुनिया है जो हमारे कर्तव्यो की दुनिया है.
तो मेहा जब ये बाते तुमने ही मुझे सीखाई की ...कर्तव्य से अधिक महत्व की कोई वस्तु नही तो आज क्यो कमजोर पड़ती हो.माना की हमने बड़े प्यार से इस प्रेम को सीचा है..इसमे ढेर सारे फूल लगाए ..रीश्तो के हर अंधेरे को हमने टिमटिमाते तारों से सजाया है..किंतु हमारा ये प्रेम जिसमे हमने हमेशा आदर्शवादिता की बात की है ..क्या उनका अब कोई मतलब नही है..
मेहा हम एक दूसरे के है ..और ये परम सत्य है..इसको कोई परिवर्तित नही कर सकता है..और हम हमेशा एक दूसरे के रहेंगे..चाहे हम निकट हो या दूर."

अनुमेहा ने कहा : "हाँ शिशिर हमे त्याग करना होगा..परमपिता ने हमे मिलाया..हमे इतने सारे सपने दिए..इतनी सारी खुशिया दी..अब ये हमारा समय है देने का इस समाज को इस दुनिया को..ये समय है...ये समय है...(अनुमेहा के होंठ बुदबुदाने लगे) और उसकी आँखे भर आई.
शिशिर ये जो अनगिनत राते हमने जाग कर अथक परिश्रम कर छोटे छोटे टुकड़ो को जोड़ कर ये रिश्ता बनाया है..ये जो हमने अपनी सारी जींदगी इस रिश्ते के लिए अर्पण कर दिया ..क्या वो सब व्यर्थ था..क्या वो सब इसलिए था की इस रात के बाद हम वो सब भूल जाए...बोलो शिशिर चुप क्यो हो उत्तर दो?"

शिशिर ने कुछ नही बोला..उसने मेहा के उजले बगुले जैसे पैरो को अपने दोनो हाथों मे ले लिया..और अपने होंठ उसके पैरो पे रख दिए ..मेहा ने कुछ नही बोला ना ही उसने अपने पैर ही खीचे...दोनो शांत बहोत देर तक वैसे ही बैठे रहे..

अब धुँधलाका छटने लगा.. ख़त्म हो गयी वो आखरी रात और ख़त्म हो गया वो प्रेम भरी अनंत रातों का सिलसिला..नही ख़त्म हो पायी तो उनकी बाते..नही ख़त्म हो पाया तो वो अनंत विवाद जो चला आ रहा है अनंत काल से ..
अब तो सिर्फ़ वियोग है...विछोह है और पीड़ा है....

Monday, March 9, 2009

होली

आप सभी लोगो को होली की रंग बिरंगी शुभकामनाये ...होली के इन सुन्दर रंगों की तरह आप सभी लोगो का जीवन खुशियों के अनेक रंगों से भर जाये ...

इन्तेज़ार

हम इन्तेजार कर रहे है,
मौसम बदले गए फिजाये बदल गयी,
शिखाये फिर से सजी लताए बदल गयी ,
पर तुम नहीं आये.
हवाओ में भी नमी आ गयी,
धुप भी अब हलकी हो गयी ,
घनघोर घटा छा गयी,
रिमझिम फुहारे धरती स्पर्श पा गयी,
फिर भी तुम नहीं आये.
शाम अब कुछ गेहेराने लगी,
तारे आकाश में टिमटिमाने लगे,
चाँद पुरे शबाब पे आया,
रात का साया जग पे छाया,
फिर भी तुम नहीं आये.
सुबह की हल्की ओस से,
जब हमारी देह धूलि ,
हमें होश आया ,
रात बीत गयी सुबह हो आया,
फिर भी तुम नहीं आये .
मौसम बदले फिजाये बदले,
चाहे रात जाये सुबह आये ,
ऐसे ही अनगिनत बसंत,
हम तुम्हारा इन्तेज़ार करेंगे ,
देखते है पहेले कौन आता है,
तुम या मृत्यु ….????

Thursday, March 5, 2009

AAP

Bina tumhare jeevan kalpana me bhi kalpit nahi ,

Bina tumhare madhuban khilkar bhi pushpit nahi,

Bina tumhare ye nain mohit hokar bhi nirmal nahi,

Bina tumhare ye mann santript hokar bhi santusht nahi,

Mann ki peeda tann ki agni aur hriday ki pyaas ho,

Sham subah ki parchayi ho aur ekaant ki tanhayi ho,

Sawan ki rimjhim boondo me ho,

Basant ke suwaseet pulkeet phoolo me ho ,

Chand ki sheetalta me ho aur taro ki jhilmilta me ho,

Nischhal nishkapat prem tum ho,

Saral santript jeevan tum ho,

Manav mann ki tripti ho ,

Manav jeevan ki sanskreeti ho,

Tum praan tum tanmayta ho,

Mann mastishk ke geet tum hi ho,

Saral viveki sach sach kahu ,

Tum hi mere preet ho.